विजय सेतुपति की 'महाराजा' फिल्म समीक्षा
तेलुगु फिल्म 'महाराजा' का नाम सुनते ही एक असाधारण कहानी की उम्मीद बंध जाती है और निर्देशक निथिलन स्वामिनाथन ने इस उम्मीद को पूरे 100 प्रतिशत पर खरा उतारा है। विजय सेतुपति और कई अन्य मंझे हुए कलाकारों की प्रस्तुति से सजी यह फिल्म एक मनोरंजक और भावना प्रधान अनुभव है।
फिल्म का प्रतीकात्मक नाम और उसकी कहानी
फिल्म 'महाराजा' वास्तव में एक सूक्ष्म दृष्टिकोण है एक आम आदमी की जिंदगी का, जो कठिन परिस्थितियों के चलते असाधारण बन जाता है। महाराजा, जो निम्न-मध्यम वर्गीय ब्राह्मण है और एक छोटे सैलून का मालिक है, फिल्म का मुख्य पात्र है। कहानी का मजेदार मोड़ तब आता है जब कुछ चोर उसके घर से कूड़ेदान चुराते हैं। इस सामान्य से लगने वाले घटना से महाराजा की अद्भुत क्षमता और चुनौतियों का सामना करने की उसकी दृढ़ता सामने आती है।
यह एक अनोखी अवधारणा है, जो यह दर्शाती है कि छोटे-छोटे इवेंट भी जिंदगी की दिशा बदल सकते हैं। विजय सेतुपति ने महाराजा के किरदार को इतनी सहजता और जीवंतता से निभाया है कि दर्शकों को लगता है जैसे वे उसके संघर्ष और सफर का हिस्सा हो गए हैं।
विजय सेतुपति का अभिनय और प्रमुख दृश्य
विजय सेतुपति, जिन्हें उनके विविध अभिनय शैली के लिए जाना जाता है, ने 'महाराजा' में अपने टैलेंट का एक और सबूत दिखाया है। फिल्म में हास्य और भावना का समावेश बड़ी चतुराई से किया गया है। फिल्म की पहली हिस्सा हंसी-मजाक और मनोरंजन से भरी हुई है, विशेषतः पुलिस थाने के दृश्य ने दर्शकों को जमकर हंसाया। वहीं, दूसरे हिस्से में भावनात्मक दृश्य और टि्वस्ट दर्शकों को बांधे रखते हैं।
विजय के साथ अनुराग कश्यप, अभिरामी, ममता मोहनदास, भरतिराजा और अन्य सह-कलाकारों की भूमिकाओं ने फिल्म को और भी रोचक बनाया है। अनुराग कश्यप का किरदार फिल्म में महत्वपूर्ण मोड़ लाता है और कहानी को एक नई दिशा देता है।
कटुसद अंत और विजय सेतुपति का अदाकारी का शिखर
फिल्म का अंत एक रोमांचक और भावनात्मक ऊंचाई पर समाप्त होता है। क्लाइमेक्स बहुत गहराई लिए हुए है, जहां विजय सेतुपति ने अपनी अभिनय क्षमता का पूरा प्रदर्शन किया है। यह सिर्फ एक कहानी नहीं बल्कि एक अनुभव है जो दर्शकों के साथ लंबे समय तक जुड़ा रहता है।
फिल्म का संगीत और बैकग्राउंड स्कोर भी कहानी को उभारने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। गीत और संगीत ने फिल्म की भावनाओं को और गहरा बनाकर उसे दर्शकों के दिलों में और गहराई से बिठा दिया है।
कुल मिलाकर, 'महाराजा' को विजय सेतुपति की दमदार अभिनय की प्रस्तुति के रूप में याद रखा जाएगा। यह फिल्म दर्शकों को मनोरंजन के साथ-साथ एक महत्वपूर्ण संदेश भी देती है कि हर आम व्यक्ति के भीतर एक असाधारण शक्ति होती है, जिसे एक सही घटना या परिस्थिति उभार सकती है।
निष्कर्ष
विजय सेतुपति की 'महाराजा' एक अनोखी और सारगर्भित फिल्म है, जो एक साधारण सी कहानी के माध्यम से एक पार्थिव संदेश देती है। यह फिल्म उनकी अब तक की बेहतरीन प्रस्तुतियों में से एक है और निथिलन स्वामिनाथन द्वारा निर्देशित एक उत्कृष्ट कृति है। इसे देखना किसी यात्रा से कम नहीं है, जहां हर दृश्य और संवाद दर्शकों को एक नई दुनिया में ले जाता है।
14 टिप्पणि
Dinesh Kumar
जून 18, 2024 at 08:52 पूर्वाह्न
ये फिल्म?!?!?! ये तो सिर्फ फिल्म नहीं - ये तो एक धमाका है!!! विजय सेतुपति ने जो किया, वो अभिनय का नहीं, जीवन का दर्शन था!!!
पहले हास्य, फिर दर्द, फिर वो अंत... मैंने अपनी माँ को फोन कर दिया - उसने भी रो दिया! ये फिल्म किसी रोज की नहीं, किसी जन्म की है!!! देखो ना ये फिल्म - वरना तुम्हारा जीवन अधूरा रह जाएगा!!!
shubham jain
जून 20, 2024 at 04:29 पूर्वाह्न
फिल्म का नाम 'महाराजा' है, पर कहानी एक सैलून मालिक की है। यह विरोधाभास निर्देशक ने सही तरीके से प्रस्तुत किया है। विजय सेतुपति का अभिनय तकनीकी रूप से उत्कृष्ट है। कोई अतिशयोक्ति नहीं।
shivam sharma
जून 21, 2024 at 21:57 अपराह्न
अरे भाई ये फिल्म देखो ना अभी तक ने देखी तो तुम भारतीय सिनेमा को नहीं जानते! बॉलीवुड के बादलों में छिपे लोगों को ये फिल्म दिखाएगी कि तमिल सिनेमा क्या है! विजय सेतुपति ने जो किया वो किसी अभिनेता ने नहीं किया - ये तो एक देवता ने किया! अगर तुम इसे नहीं देखे तो तुम एक भारतीय नहीं हो!
Sanjay Gandhi
जून 22, 2024 at 06:59 पूर्वाह्न
मैं तो अभी तक बांग्लादेश में रहता हूँ, पर इस फिल्म ने मुझे रो दिया। क्या तुम जानते हो कि ये कहानी सिर्फ तमिलनाडु की नहीं - ये हर भारतीय की है?
मेरे दादा भी एक छोटे सैलून में काम करते थे। वो भी कभी कूड़ेदान चुराए जाने पर बहुत गुस्सा हो जाते थे। फिल्म ने मुझे उन्हें याद कर दिया। धन्यवाद, निथिलन।
Shreya Prasad
जून 22, 2024 at 12:05 अपराह्न
मैं इस फिल्म को एक शिक्षाविद के रूप में देख रही हूँ - यह एक उत्कृष्ट उदाहरण है जीवन के असाधारण अंशों को सामान्य व्यक्ति के माध्यम से कैसे प्रस्तुत किया जा सकता है। विजय सेतुपति का अभिनय शिक्षण के लिए एक आदर्श नमूना है। फिल्म के संगीत और संवादों में भावनात्मक सूक्ष्मता का अद्भुत संगम है।
GITA Grupo de Investigação do Treinamento Psicofísico do Atuante
जून 24, 2024 at 07:06 पूर्वाह्न
मुझे लगता है कि यह फिल्म अत्यधिक अतिशयोक्ति से भरी है। विजय सेतुपति का अभिनय उत्कृष्ट है, लेकिन क्या वास्तव में यह उनकी बेहतरीन प्रस्तुति है? मैंने 'पार्थिव' शब्द का उपयोग भी अतिशयोक्ति मानता हूँ। यह फिल्म अच्छी है, लेकिन इतनी अद्भुत नहीं जितना कहा जा रहा है।
Srujana Oruganti
जून 25, 2024 at 10:08 पूर्वाह्न
बोर हो गया।
fatima mohsen
जून 25, 2024 at 21:07 अपराह्न
इस फिल्म को देखने वाले लोगों को याद रखना चाहिए - ये फिल्म तो बस एक ब्राह्मण की कहानी है, और आप सब इसे बड़ा बना रहे हो! जब तक हम अपने अहंकार को नहीं छोड़ेंगे, तब तक भारतीय सिनेमा बस इतना ही रहेगा। विजय सेतुपति अच्छे हैं, लेकिन ये फिल्म नहीं। 😒
Pranav s
जून 27, 2024 at 11:18 पूर्वाह्न
मुझे लगता है ये फिल्म बहुत ज्यादा बढ़ा दी गई है। एक छोटा सा कहानी को इतना बड़ा बना दिया... विजय तो अच्छा है पर फिल्म का निर्माण बहुत धीमा था।
Ali Zeeshan Javed
जून 27, 2024 at 15:18 अपराह्न
मैंने ये फिल्म अपने बेटे के साथ देखी - उसे 12 साल है। उसने कहा, 'पापा, क्या हम भी ऐसे बन सकते हैं?' मैंने उसे गले लगा लिया।
ये फिल्म ने मुझे याद दिलाया कि हर आदमी के अंदर एक राजा होता है - चाहे वो ब्राह्मण हो या अन्य। ये फिल्म भारत की वास्तविकता को दर्शाती है। धन्यवाद।
Žééshañ Khan
जून 29, 2024 at 07:43 पूर्वाह्न
इस फिल्म के संदेश का विश्लेषण करने के लिए एक विस्तृत दार्शनिक ढांचे की आवश्यकता है। विजय सेतुपति के अभिनय में एक निर्मित वास्तविकता का प्रतिबिंब है, जो सामाजिक असमानता के अंतर्गत एक निर्मित नायक की आवश्यकता को दर्शाता है।
ritesh srivastav
जून 30, 2024 at 02:45 पूर्वाह्न
ये फिल्म बॉलीवुड के लिए एक चुनौती है। हमने इतना बड़ा बना दिया एक तमिल फिल्म को - अब तो बॉलीवुड के लोग भी इसे नकल करने लगेंगे। भारतीय सिनेमा का असली राजा तमिलनाडु में है।
sumit dhamija
जुलाई 1, 2024 at 17:58 अपराह्न
मैं अपने दोस्त के साथ इस फिल्म को देखने गया था। उसने कहा - 'ये फिल्म तो एक बार देखने से नहीं, बार-बार देखने वाली है।'
मैंने उसे ठीक कहा। इस फिल्म का एक दृश्य - जब विजय चाय की दुकान पर खड़ा होकर बाहर की ओर देखता है - मैंने उसे 5 बार देखा। उस दृश्य में सब कुछ है।
anil kumar
जून 16, 2024 at 09:31 पूर्वाह्न
महाराजा बस एक फिल्म नहीं, एक जीवन का संदेश है। विजय सेतुपति ने एक सैलून वाले आदमी को इतना जीवंत कर दिया कि लगा जैसे हमने उसकी चाय की दुकान पर बैठकर उसकी बातें सुनी हों। ये फिल्म आम आदमी के अंदर के राजा को जगाती है - जो हम सबमें है, बस किसी ने नहीं देखा।
अनुराग कश्यप का किरदार तो बिल्कुल जादू था - एक ऐसा विषय जो फिल्म के बीच में आकर उसे एक नए आयाम में ले गया। और अंत? ओह भगवान... मैंने दो मिनट तक बस बैठा रहा, दिल में कुछ बोल रहा था, पर मुंह नहीं खुला।